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Friday, December 9, 2022

जाने ऑटिज्म चिकित्सा व्यवस्था : आचार्य डॉक्टर आरपी पांडे 

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जाने ऑटिज्म चिकित्सा व्यवस्था : आचार्य डॉक्टर आरपी पांडे 

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जाने ऑटिज्म चिकित्सा व्यवस्था : आचार्य डॉक्टर आरपी पांडे 

मकरध्वज रस
1 गोली
नवरतन रस
½ गोली
ब्रह्म रसायन 1/2 चम्मच
विधि : दोनों गोलियो को पीस कर ब्रह्म रसायन के साथ मिलाकर 10 मिनट तक खल मे घोटे , बच्चे को छटा दे ऊपर से दूध पिलाये (अगर उतनी का दूध मिले तो अति उत्तम अन्यथा गाय का दूध ले । )
ये एक खुराक है
सुबह एवं शाम को दो बार दे । कुछ खाने के बाद ।

अर्क ब्राह्मी (हमदर्द)
½ चम्मच अर्क ब्राह्मी 2 चम्मच पानी मिलाकर दोनों समय खाना खाने के बाद ।

माल्कांगिनी (ज्योतिष्मती) तेल
1 बूंद नाक मे डाले सुबह के समय (लंबे समय तक डालते रहे।)

ब्राह्मी घृत
1 से दो बूंद नाक मे डाले रात को सोते समय (लंबे समय तक डालते रहे।)

ज्योतिष्मती (मालकांगिनी) तेल
पूरे शिर मे रात के समय 5 से 10 मिनट अंगुली के पोरो से मालिश करें।

क्या है ऑटिज्म
ऑटिज्म एक मानसिक विकार है, जिसमें रोगी बचपन से ही परिवार, समाज व बाहरी माहौल से जुड़ने की क्षमताओं को गंवा देता है। फिल्म ‘माई नेम इज खान’ तो में शाहरुख खान को माइल्ड ऑटिज्म होता है। यह बीमारी 6 की उम्र में ही पनपनी शुरू हो जाती है। हालांकि जागरूकता की कमी के चलते बीमारी का देर से पता चलता है। इस बीमारी के बारे में लखनऊ की मनोरोग विशेषज्ञ डॉ शाजिया सिद्दिकी बताती हैं, ये कोई बीमारी नहीं है और अभी तक कोई भी रिसर्च ये नहीं पता कर पाई है कि ये किस कमी से होता है कुछ लोगों का कहना ये गर्भावस्था में पोषण की कमी से होता है और कुछ जानकारों का मानना है तनाव के कारण होता है। क्या है ऑटिज्म यह एक तरह का न्यूरोलॉजिकल डिसॉर्डर है, जो बातचीत और दूसरे लोगों से व्यवहार करने की क्षमता को सीमित कर देता है। इसे ऑटिस्टिक स्पैक्ट्रम डिसॉर्डर कहा जाता है, क्योंकि प्रत्येक बच्चे में इसके अलग-अलग लक्षण देखने को मिलते हैं। इनमें से कुछ बच्चे बहुत जीनियस होते हैं या उनका आईक्यू सामान्य बच्चों की तरह होता है, पर उन्हें बोलने और सामाजिक व्यवहार में परेशानी होती है। कुछ ऐसे भी होते हैं, जिन्हें सीखने-समझने में परेशानी होती है और वे बार-बार एक ही तरह का व्यवहार करते हैं। चूंकि ऑटिस्टिक बच्चों में सहानुभूति का अभाव होता है, इसलिए वे दूसरों तक अपनी भावनाएं नहीं पहुंचा पाते या उनके हाव-भाव व संकेतों को नहीं समझ पाते। कुछ बच्चे एक ही तरह का व्यवहार बार-बार करने के कारण थोड़े से बदलाव से ही हाइपर हो जाते हैं।

क्या हैं लक्षण बोलचाल व शाब्दिक भाषा में काफी कमी आ जाती है। पीड़ित बच्चे सही समय पर सही बात नहीं कहते और अपनी जरूरतों को भाषा या शब्दों का प्रयोग करके नहीं कह पाते।
यदि बच्चे को भोजन करना है तो वह यह नहीं बोलता कि मुझे खाना दो। इसके विपरीत वह मां का हाथ पकड़ कर रसोई तक ले जाता है और मां अपने आप बात को समझ कर बच्चे को खाना दे देती है।
खिलौनों, चाबी, रिमोट आदि को बार-बार पटकना, सुने-सुनाए व खुद के ईजाद किए शब्दों को बार-बार बोलते रहना, अपनी परछाईं से खेलते रहना उनकी आदत बन जाता है।
क्या हैं इसके कारण ऑटिज्म के वास्तविक

कारणों के बारे में फिलहाल जानकारी नहीं मिल पाई है। शोधों की बात करें तो कहा जाता है कि प्रेग्नेंसी के दौरान मां में थाइरॉइड की कमी भी इसका कारण हो सकती है। ऑटिज्म का इलाज ऑटिज्म एक प्रकार की विकास संबंधी बीमारी है, जिसे पूरी तरह से ठीक किया जा सकता है , सही प्रशिक्षण और परामर्श की मदद से रोगी को बहुत कुछ सिखाया जाता है ताकी वह रोजमर्रा के काम खुद कर सकें।
ज्यादातर ऐसे बच्चों में बात चीत और समझाने की क्षमता कम होती है। इसलिए उनकी कम्यूनिकेशन स्किल को सुधारने की ओर प्रयास करना चाहिए। इसके लिए बच्चे की थेरेपी लगातार चलती है जिससे उसे नॉर्मल करने की कोशिश की जाती है। ऑटिज्म बच्चे की मदद बच्चों को शारीरिक खेल के लिए प्रोत्साहित करें। पहले उन्हें समझाएं, फिर बोलना सिखाएं। खेल-खेल में उन्हें नए शब्द सिखाएं। छोटे-छोटे वाक्यों में बात करें। खिलौनों के साथ खेलने का सही तरीका बताएं। बच्चे को तनाव मुक्त रखें।

ऑटिज्म के इलाज के लिए थेरिपी
ऑटिज्म एक तरह की विकास संबंधी बीमारी है, जो पूरी तरह से तो ठीक नहीं हो सकती है। लेकिन, सही ट्रेनिंग की मदद से रोगी को बहुत कुछ सिखाया जा सकता है। इससे ऑटिज्म के रोगी की दैनिक कार्य आसान होते हैं। ऑटिज्म के इलाज (Treatment for Autism) के तौर पर दी जाने वाली थेरिपी-
व्यवहार संबंधी थेरिपी (Behavioural management)
व्यवहार प्रबंधन थेरिपी या (Behavioral management therapy) थेरिपी मुख्य रूप से रोगी के व्यवहार को सकारात्मक दिशा देती है। इसमें रोगी को ट्रेनिंग देने के साथ-साथ अच्छे और बुरे व्यवहार में फर्क सिखाया जाता है, जिसके बाद वो खुद इसे समझ सके। ऑटिज्म का इलाज (Treatment for Autism) करने में अप्लाइड बिहेवियर एनालिसिस यानी ABA की मदद ली जाती है। इसके कई प्रकार होते हैं, जैसे-

1- पॉजिटिव बियेवियरल (PBS) Positive behavioural and support
पीबीएस यानी पॉजिटिव बियेवियरल एक ऐसी तकनीक है जिसके अतंर्गत ऑटिज्म का इलाज (Treatment for Autism) किया जाता है। इसमें व्यक्ति के व्यवहार को उसके आसपास के वातावरण में बदलाव कर उसे सकारात्मक बनाने के प्रयास किए जाते हैं। पहले देखा जाता है कि किस वजह से रोगी के व्यवहार में बदलाव आ रहा है। इसके बाद रोगी को नई चीजें सिखाई जाती हैं और अच्छा व्यवहार करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

2- अर्ली बियेवियरल इंटरवेंशन (EIBI) Early intensive behavioural intervention
इसे अर्ली बियेवियरल इंटरवेंशन कहते हैं, जो 5 साल से कम के बच्चों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसमें बच्चों को छोटे-छोटे इंस्ट्रक्शन दिए जाते हैं। बच्चों में ऑटिज्म का इलाज (Treatment for Autism) करने के लिए अर्ली बियेवियरल इंटरवेंशन किया जाता है।

3- ऑटिज्म का इलाज: पाइटल रिस्पॉन्स ट्रेनिंग (PRT) Pivotal response training
इसे पाइटल रिस्पॉन्स ट्रेनिंग कहते हैं। इस तकनीक में रोगी को रोज एक तरह की ट्रेनिंग दी जाती है, जिसमें उसे अपने व्यवहार को कंट्रोल करने, नई चीजें सीखने के लिए और दूसरे लोगों से घुल-मिलने के लिए लगातार प्रोत्साहित किया जाता है। इस तरह से ऑटिज्म का इलाज (Treatment for Autism) किया जाता है।

4- डिस्क्रीट ट्राइल ट्रेनिंग (DTT) Discrete trial training
डिस्क्रीट ट्राइल ट्रेनिंग के अंतर्गत ऑटिज्म का इलाज (Treatment for Autism) करने के लिए एक टीचर रोगी को एक के बाद एक लेसन देता है। इसके बाद रोगी से इसके जवाब और सही व्यवहार के बारे में पूछा जाता है। सही जवाब देने और उचित व्यवहार करने पर उसे गिफ्ट देकर प्रोत्साहित किया जाता है।

5- संज्ञानात्मक व्यवहार चिकित्सा (Cognitive behavior therapy)
कॉग्निटिव बिहेवियर थेरिपी में सोच, भावनाओं और व्यवहार के बीच संबंध के आधार पर ऑटिज्म रोगी की मदद की जाती है। इसके मदद से रोगी को चिंता, भावनात्मक समस्याएं और दूसरी सामाजिक परेशानियों से निपटने में मदद मिलते है। इस चिकित्सा में डॉक्टर, ऑटिज्म रोगी और उसके परिवार के लोग साथ मिलकर बीमारी से लड़ने की दिशा में काम करते हैं। कॉग्निटिव बिहेवियर थेरिपी ऑटिज्म का इलाज (Treatment for Autism) करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली मुख्य थेरिपी है।

6-शिक्षात्मक चिकित्सा (Educational therapy)
इस चिकित्सा में ऑटिज्म रोगी (Autism patients) के कौशल विकास और संचार कौशल को विकसित करने की दिशा में काम किया जाता है। इसमें एक्सपर्ट्स की टीम खासतौर पर रोगी के लिए केंद्रित प्रोग्राम तैयार करते हैं।

7- ऑटिज्म का इलाज: आहार चिकित्सा (Dietary approaches)
कई वजहों से ऑटिज्म के रोगियों में जरूरी पोषक तत्वों की कमी होती है और कई कुपोषित होते हैं। इसकी वजह से भी उनके विकास में परेशानी आती है। कुछ रोगी किसी एक ही प्रकार का खाना खाते हैं, तो कुछ खाना खाने से डर लगता है। डर की वजह डाइनिंग टेबल, तेज लाइट या वातावरण हो सकता है। कुछ इसलिए भी नहीं खाते क्योंकि उन्हें लगता है कि उनकी बीमारी की वजह उनका खाना है। ऐसी स्थिति में बच्चे के माता-पिता या केयरटेकर किसी डाइटीशियन की मदद लेकर उसके खाने का प्लान बना सकते हैं। डाइटीशियन बच्चे का चेकअप कर उसके लिए पौष्टिक खाने का चार्ट बनाते हैं, जिससे बच्चा कुपोषण और उससे संबंधित बीमारियों से बच सकता है।

8- ऑटिज्म का इलाज ऑक्यूपेशनल थेरिपी (Occupational therapy) से
इस थेरिपी में ऑटिज्म रोगी को दैनिक जीवन से जुड़े काम पूरे करने के लिए दिए जाते हैं। इसकी मदद से वे भविष्य में इन चीजों को करने में सक्षम हो जाते हैं। उदाहरण के तौर पर शुरुआती अवस्था में बच्चों को कपड़े पहनना या चमच्च का इस्तेमाल जैसी चीजें सिखाई जाती हैं।
9- ऑटिज्म का इलाज: फैमिली थेरिपी (Family therapy)
फैमिली थेरिपी में ऑटिज्म रोगी के परिवार, उसके दोस्त और देखभाल करने वाले लोगों को सिखाया जाता है कि कैसे रोगी के साथ व्यवहार, बातचीत और खेलकूद करें। इसकी मदद से वो तेजी से चीजें सीखता है और ऑटिज्म की वजह से होने वाले नकारात्म व्यवहार से बचता है।
10-दवाईयां (Medications)
ऑटिज्म पूरी तरह ठीक हो सकता है आयुर्वेद की दवाइयो से समय लंबा लगया है , सफलता के लिए धेर्य आवश्यक है ,बीच मे इलाज बंद ना करे ।
11- ऑटिज्म का इलाज: फिजिकल थेरिपी (Physical therapy)
कुछ ऑटिज्म रोगियों को चलने फिरने में भी परेशानी आती है। ऐसी स्थिति में फिजिकल थेरिपी का सहारा लिया जाता है। इसमें रोगी को कुछ एक्सरसाइज (Workout) सिखाई जाती हैं, जिससे उसके स्वास्थ, ताकत, बॉडी बैलेंस (Balance body) आदि में सुधार आए।

12-सामाजिक कौशल चिकित्सा (Social skills training)
इस तरह की ट्रेनिंग में ऑटिज्म रोगी को समाज में लोगों से बातचीत का तरीका और दैनिक जीवन की समस्याओं से निपटना सिखाया जाता है।
13-स्पीच थेरिपी (Speech therapy)
कई ऑटिज्म रोगी बोलचाल में बेहद कमजोरी होते हैं और उन्हें भाषा संबंधी परेशानी आती हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें छोटे बच्चों की तरह शुरुआत से बोलचाल का तरीका सिखाया जाता है।
अगर शुरुआत में ही मिल जाए ऑटिज्म का इलाज: (Treatment for Autism)
ऑटिज्म का इलाज (Treatment for Autism) जितनी शुरुआत में होगा रोगी के भविष्य के लिए ये उतना बेहतर होगा। शुरुआत में बच्चे को कई उपरोक्त में से कई ट्रेनिंग दी जा सकती हैं जो कि बाद में कठिन हो जाती हैं। ये सभी थेरिपी ऑटिज्म रोगी के विकास में बेहद लाभकारी हैं। ऐसे में कोई भी ऑटिज्म रोगी है तो डॉक्टरी सलाह लेकर ऑटिज्म का इलाज इन थेरिपी के साथ किया जा सकता है।
अगर आपको अपनी समस्या को लेकर कोई सवाल हैं, तो कृपया अपने डॉक्टर से परामर्श लेना ना भूलें।

ऑटिज्म में न्यूट्रिशन टिप्स फॉलो करना हो सकता है मददगार

ऑटिज्म आज भी मेडिकल साइंस के लिए एक पहेली बना हुआ है। बच्चों में होने वाली इस बीमारी के बारे में जानकारी जुटाने के लिए दुनिया भर शोध किए जाते रहते हैं। बावजूद इसके ऑटिज्म के बारे में बहुत कुछ समझना बाकी है। इसका एक कारण यह भी है कि इस बीमारी से जूझ रहे हर व्यक्ति के लक्षण, कारण और इलाज अलग होते हैं। ऑटिज्म को समझने और इसके इलाज को विकसित करने के लिए भी शोध होते रहते हैं।
ऑटिज्म की बीमारी का दिमागी संरचना पर भी असर पड़ता है। साथ ही किए गए शोधों में यह भी सामने आया है कि जन्म के समय सामान्य से कम वजन और असामान्य दिमागी संरचना वाले बच्चों में ऑटिज्म की बीमारी का शिकार होने की आशंका बहुत अधिक होती है। इसके अलावा शोध के दौरान पाया गया कि ऑटिज्म की बीमारी से जूझ रहे बच्चों में दिमाग के वे भाग असामान्य पाए गए, जो भावनाओं और विचारों को कंट्रोल करते हैं। ऑटिज्म की समस्या में डायट का भी खास ख्याल रखने की जरूरत होती है। ऑटिज्म में न्यूट्रिशन टिप्स को अपनाकर भी इसे कंट्रोल करने की कोशिश की जा सकती है।
पौष्टिक आहार आपके बच्चे के शरीर को मजबूत और दिमाग को तेज बनाता है। जब हम ऑटिज्म की बात करते हैं, तब संतुलित आहार इसके लक्षणों को कम करने में मदद करता है। ऐसे में ऑटिज्म ग्रस्त बच्चों के लिए खास तरह का डाइट प्लान बनाया जाता है। आइए जानते हैं ऑटिज्म में न्यूट्रिशन टिप्स।
ऑटिज्म में न्यूट्रिशन टिप्स में बच्चों को कुछ नया खिलाएं
जब आपके बच्चे को ऑटिज्म होता है, तो वो कई तरह के खाद्य पदार्थ, उनके स्वाद, गंध, बनावट या रंग को देखकर संवेदनशील हो सकता है और वह उसे खाने से इंकार कर देता है। ऐसे में नए तरह का खाना खिलाना भी एक चुनौती होता है, इसलिए इस दिशा में धीरे-धीरे कदम उठाना चाहिए। इसके लिए आप एक खास तरीका अपना सकते हैं। जब आप शॉपिंग पर जाएं तो अपने बच्चे को साथ ले जाने की कोशिश करें और उसे अपनी पसंद का खाना चुनने को कहें। जब आप वह खाना घर लाएं तो उसे संतुलित तरीके से बनाने की कोशिश करें। हो सकता है कि खाना बनने के बाद बच्चा खाने से इंकार कर दे। ये बेहद सामान्य बात है, उसे इस चीज से परिचित होने में वक्त लग सकता है। ऑटिज्म में न्यूट्रिशन टिप्स को फॉलो करके इसके लक्षणों को कम किया जा सकता है।
खाने का एक वक्त तय करें
ऑटिज्म में न्यूट्रिशन टिप्स के तहत खाने का समय तय करने से फायदा हो सकता है। ऑटिज्म ग्रस्त बच्चे खाना खाने से बचते हैं। इसके पीछे घर का वातावरण, लाइट या महज आपके घर का फर्नीचर भी हो सकता है, जिससे उसे डर या असहज महसूस होता हो। ऐसे में खाने का वक्त तय करना काफी मददगार साबित हो सकता है। आप एक तय समय पर बच्चे को खाना देकर उसे परेशान होने से बचा सकते हैं। आप खाना परोसे जाने वाली जगह पर कम लाइट या मोमबत्ती का इस्तेमाल कर सकते हैं।
ऑटिज्म में न्यूट्रिशन टिप्स में शामिल है खास तरह की डायट
ऑटिज्म ग्रस्त बच्चों के लिए डायट हमेशा खास रखने की जरूरत होती है। इसका अर्थ है कुछ ऐसे फूड आयटम्स डायट से हटाना जो उन्हें हानी पहुंचा सकते हैं। जैसे सोया, ग्लूटेन और केसिन से बनी चीजें।
पैक खाने का लेबल चेक करें
हमेशा अपने बच्चे के लिए खाना खरीदने से पहले उसपर चिपके लेबल को जरूर देखें। इससे आप उसमें मिली सामग्री, पौष्टिक तत्व और केमिकल की जानकारी जुटा लेंगे। इससे आप पता लगा सकते हैं कि वो खाद्य पदार्थ आपके बच्चे के लिए फायदेमंद है या नुकसानदेह । क्योंकि कई बार ग्लूटेन अैर केसिन (gluten and casein) युक्त भोजन ऑटिज्म की स्थिति को और गंभीर बना देता है। ऑटिज्म में न्यूट्रिशन टिप्स को फॉलो करते समय जरूरी है कि आप पैकेज्ड खाने का लेवल ठीक से चेक करें।
ग्लूटेन युक्त फूड से बचना भी ऑटिज्म में न्यूट्रिशन टिप्स में है शामिल
ग्लूटेन आमतौर पर गेहूं और जौ में पाया जाता है। इससे बनी ब्रैड, केक और पास्ता जैसी चीजों में भी इसकी अधिकता रहती है। किसी खाने में यूं तो ग्लूटेन की मात्रा को घटाया नहीं जा सकता लेकिन कई खास तरह की खाद्य साम्री आजकल बाजार में उपलब्ध है, जो ग्लूटेन फ्री होती है। ऑटिज्म में डायट प्लान तैयार करते समय आपको इस तरह की चीजों को अवॉयड करने की जरूरत होगी।
ऑटिज्म में न्यूट्रिशन टिप्स है केसिन से बचना
आमतौर पर केसिन उन खाद्य पदार्थों में पाया जाता है, जिनमें लैक्टोज (lactose) होता है। लैक्टोज मुख्य रूप से डेयरी प्रोडक्ट में पाया जाता है। लेकिन, डेयरी प्रोडक्ट विटामिन डी और सी के भी सबसे स्त्रोत होते हैं। ऐसे में केसिन से बचने के लिए अगर इनका सेवन रोक दिया जाए, तो विटामिन डी और सी की भरपाई के लिए सप्लिमेंट लेना जरूरी हो जाता है।
ऑटिज्म में डायट तय करते समय सोया प्रोडक्ट का करें यूज
सोया और सोया से बनी अन्य खाद्य सामग्री भी ऑटिज्म रोगियों में एलर्जी पैदा करने के साथ-साथ उन पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती हैं। इसी वजह से सोया से बनी खाद्य साम्री जैसे सोया सॉस, सोया, टोफू और सोया मिल्क के सेवन से बचना चाहिए।
अगर आपको लगता है कि ऑटिज्म एक दिमाग संबंधी बीमारी है और खान-पान का इस पर असर नहीं पड़ता, तो आप गलत सोच रहे हैं, क्योंकि खानपान का सीधा असर इस बीमारी पर पड़ता है। ऐसे में ग्लूटेन, केसिन और सोया से बनी चीजों को ऑटिज्म में डायट प्लान तैयार करते समय में शामिल नहीं किया जाना चाहिए।
ऑटिज्म में न्यूट्रिशन टिप्स के लिए किसी विशेषज्ञ की मदद लें
बच्चे की डायट के मामले में किसी डॉक्टर, डायट एक्सपर्ट आदि की मदद ली जा सकती है। वे बेहतर जानते हैं कि आपके बच्चे की इस स्थिति के लिए खाना और परहेज जरूरी है। पौष्टिक आहार बच्चे के विकास में बेहद जरूरी रहता है और खासतौर पर तब, जब आपका बच्चा ऑटिस्टिक हो।

ऑटिज्म में न्यूट्रिशन टिप्स कितनी कारगार हो सकती है, जानें इस पर क्या कहते हैं शोध
एमोरी यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन में ऑटिज्म सेंटर के शोधकर्ताओं ने खाने की समस्याओं और ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (एएसडी) से संबंधित सभी प्रकाशित अध्ययनों की समीक्षा और विश्लेषण किया है। उन्होंने इस समीक्षा में पाया कि, ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (एएसडी) (Autism spectrum disorder (ASD) वाले बच्चों में भोजन की चुनौतियां होने की संभावना सामान्य बच्चों से पांच गुना अधिक हो सकती हैं, जैसे कि खाने को लेकर बच्चे के नखरे, क्या खाना है इसके लिए बहुत ही चुन कर खाना खाना या उनका ईटिंग बिहेवियर।
सामान्य तौर पर देखा जाए, तो हर बच्चे में इस तरह की आदतें विशेष रूप से देखी जा सकती हैं, लेकिन ऑटिज्म प्रभावित बच्चे में इस तरह की आदतें पांच गुना तक अधिक हो सकती हैं। जिसके कारण उन्हें उचित पोषण न मिलने के कारण ऑटिज्म वाले बच्चों में कैल्शियम और प्रोटीन जैसे जरूरी विटामिंस की अधिक कमी हो सकती है। जो शारीरिक विकास के साथ-साथ मानसिक विकास को भी प्रभावित कर सकता है। यही एक सबसे मुख्य कारण भी हो सकता है कि अक्सर ऑटिज्म प्रभावित बच्चों की हड्डियां काफी कमजोर होती हैं। जिसका मुख्य कारण उनके आहार में कैल्शियम की भारी कमी के कारण हो सकता है।
इतना ही नहीं, शोधकर्ताओं का यह भी कहना है कि इस तरह की समस्याएं बच्चे के खराब मानसिक विकास के कारण उनकी सामीजिक परेशानियों को काफी अधिक बढ़ा सकती हैं। इससे किशोरावस्था और वयस्क होने पर मोटापा और हृदय रोग जैसी आहार संबंधी बीमारियों का खतरा भी अधिक बढ़ सकता है।
कितना सुरक्षित है ऑटिज्म में न्यूट्रिशन टिप्स से केसिन से बचना?
कई माता-पिता का कहना है कि ऑटिज्म प्रभावित बच्चे के आहार से केसिन की मात्रा (दूध) और ग्लूटेन (गेहूं प्रोटीन) को हटाने से उनके लक्षणों में काफी सुधार होता है। हालांकि, ऐसा करना ऑटिज्म के लक्षणों को काफी हद तक कम कर सकता है, लेकिन विशेषज्ञों ने चिंता जाताई है कि ऐसा करने स बच्चे का आहार अधूरा रह सकता है। अगर आप अपने ऑटिज्म प्रभावित बच्चे के आहार से केसिन की मात्रा हटाने का विचार रहे हैं, तो अपने डॉक्टर से सलाह लें कि बच्चे को कैल्शियम और प्रोटीन की मात्रा प्रदान करने वाले अन्य आहार या तरीके क्या हो सकते हैं।

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