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विश्व पर्यावरण दिवस: पर्यावरण संरक्षण और स्थिरता के क्षेत्र में केंद्र सरकार की पहल और उपलब्धियां

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विश्व पर्यावरण दिवस जाने क्यो खास है ये दिन

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विश्व पर्यावरण दिवस : पर्यावरण संरक्षण और स्थिरता के क्षेत्र में केंद्र सरकार की पहल और उपलब्धियां

हम कभी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं कि हवा, पानी, पेड़ में से अगर एक भी न हो, तो क्या मानव जीवन का अस्तित्व रहेगा। ये तीनों ही एक दूसरे के पूरक हैं। इसलिए किसी भी एक की कमी से पूरी मानव जाति के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो सकता है। इसलिए इनका संरक्षण जरूरी है। यही वजह है कि भारत समेत पूरी दुनिया आज विश्व पर्यावरण को लेकर काफी गंभीर है और इनके जतन और संरक्षण के लिए कई नीतियां और योजनाएं बना रही है। लेकिन भारत सिर्फ योजनाएं और नीतियां बना ही नहीं रहा है, बल्कि उस दिशा में तेजी से आगे भी बढ़ रहा है। जलवायु परिवर्तन आज दुनिया की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। आज विश्व पर्यावरण दिवस पर जानते हैं, भारत इस लड़ाई में किस तरह से विश्व की मदद कर रहा है।

पंचामृत की सौगात

केंद्र सरकार सर्वे भवन्तु सुखिन: के मंत्र पर आगे बढ़ते हुए सभी के सुरक्षित व समृद्ध जीवन हेतु निरंतर प्रयासरत है। इसी के तहत नवंबर 2021 में ग्लासगो में काॅप-26 शिखर सम्मेलन भावी पीढ़ी के उज्जवल भविष्य की सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्ध भारत ने दुनिया को पंचामृत की सौगात भी दी। दरअसल, क्लाइमेट चेंज पर हुए वैश्विक मंथन पीएम मोदी ने कहा कि इस चुनौती से निपटने के लिए पांच अमृत तत्व रखना चाहता हूं, पंचामृत की सौगात देना चाहता हूं।

पहला– भारत, 2030 तक अपनी गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता को 500 गीगावाट तक पहुंचाएगा।

दूसरा– भारत, 2030 तक अपनी 50 प्रतिशत ऊर्जा आवश्यकता, नवीकरणीय ऊर्जा से पूरी करेगा।

तीसरा– भारत 2030 तक के कुल प्रोजेक्टेड कार्बन एमिशन में एक बिलियन टन की कमी करेगा।

चौथा– 2030 तक भारत, अपनी अर्थव्यवस्था की कार्बन इंटेन्सिटी को 45 प्रतिशत से भी कम करेगा।

और पांचवा– वर्ष 2070 तक भारत, नेट जीरो का लक्ष्य हासिल करेगा।

ये पंचामृत, क्लाइमेट एक्शन में भारत का एक अभूतपूर्व योगदान होंगे। भारत सतत विकास और स्वच्छ ऊर्जा के मामले में अग्रणी देशों में से एक है। अपनी सुधारात्मक, पर्यावरण के अनुकूल नीतियों के साथ, देश ने विश्व को दिखाया है कि सुदृढ़ पर्यावरण नीतियां भी सुदृढ़ अर्थव्यवस्था की राह आसान कर सकती हैं। भारत में सतत गतिशीलता की दिशा में बड़ी प्रगति के रूप में, इलेक्ट्रिक वाहन अब नई वास्तविकता बन रहे हैं। इसके साथ ही एक वैश्विक लीडर के रूप में उभर रहा भारत, भविष्य की ऊर्जा जरूरतों के लिए तैयारी कर रहा है।

हरित ईंधन की दिशा में ग्रीन हाइड्रोजन मिशन

भारत सरकार के लक्ष्यों की पूर्ति और पर्यावरण संरक्षण के साथ ही प्रदूषण को कम करने के लिए सिर्फ पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ही नहीं बल्कि सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय के अलावा भी अन्य मंत्रालय मिलकर काम कर रहे हैं। इसी के तहत वायु प्रदूषण के खतरे से निपटने और काला धुआं छोड़ती गाड़ियों से निपटने के लिए लोग इथेनॉल, मेथनॉल, बायो-डीजल, बायो-सीएनजी, बायो-एलएनजी, ग्रीन हाइड्रोजन और इलेक्ट्रिक पर स्विच कर रहे हैं। देश में हरित हाइड्रोजन की दिशा में तेजी से काम हो रहे हैं। केंद्र सरकार ने 3000 करोड़ रुपये की लागत से हाइड्रोजन मिशन की घोषणा की है।

सरकार का कहना है कि प्रौद्योगिकी और हरित ईंधन में तेजी से होती प्रगति से इलेक्ट्रिक ऑटोमोबाइल की लागत कम होगी, जिससे इनकी कीमतें अगले दो वर्षों में पेट्रोल से चलने वाले वाहनों के बराबर आ जाएगी। खास बात ये है कि इससे लोगों का खर्च भी कम होगा।

इलेक्ट्रिक वाहन को बढ़ावा

पर्यावरण संरक्षण की दिशा में इलेक्ट्रिक वाहन काफी मददगार साबित हो रहे हैं। धीरे धीरे ही सही लेकिन लोगों का रूझान इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर बढ़ा है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि एक रिपोर्ट के अनुसार 2021 के दौरान देशभर में इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री में 168 प्रतिशत का इजाफा दर्ज किया गया है। बढ़ते प्रदूषण के स्तर और ग्लोबल वार्मिंग को देखते हुए, पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों पर पेट्रोल-डीजल को छोड़ सरकार की कोशिश है कि लोग इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाएं। तेल से होने वाले प्रदूषण जहरीली गैसों के संपर्क का एक प्रमुख कारण हैं, जो पर्यावरण के वनस्पतियों और जीवों के लिए हानिकारक हैं। लेकिन वाहन में बिजली जैसे गैर-पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों का उपयोग करके पर्यावरण में हानिकारक गैसों के उत्सर्जन को रोका जा सकता है। इलेक्ट्रिक वाहनों के चार्ज के लिए जहां कई राज्यों ने अपनी नीतियां जारी कर दी है, वहीं हाईवे, एक्सप्रेस-वे पर भी केंद्र सरकार ने चार्जिंग स्टेशन बनाने की मंजूरी दे दी गई है।

भारत जैव विविधता में धनी

वन्यजीव हमारे पारिस्थितिकी तंत्र का एक महत्वपूर्ण कारक है, उनके बिना, पारिस्थितिक संतुलन एक असंतुलित स्थिति में बदल जाएगी। वन्यजीव न सिर्फ हमारे पर्यावरण को संतुलित रखते हैं, बल्कि प्रदूषण को कम करने में भी मदद करते हैं। ऐसे में भारत जैव विविधता व वन्य जीवों के मामले में धनी है। केंद्र सरकार के प्रयासों से वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्रों की संख्या में न सिर्फ 32 % की वृद्धि की है, बल्कि 2010 से 2020 तक एशियाई शेरों का संख्या में 64 % की वृद्धि की है। यानि विश्व के 70 प्रतिशत एशियाई शेर भारत में पाए जाते हैं। इसी तरह 2014 से 2018 तक बाघों की आबादी ने 33 % की वृद्धि हुई है। 2021 में पर्यावरण मंत्रालय के मुताबिक 70 प्रतिशत बाघों और 60 प्रतिशत तेंदुओं की संख्या भारत में है। वहीं अगस्त 2017 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हाथियों की कुल संख्या 27,312 दर्ज की गई। 2017 में ही हाथियों के संरक्षण के लिए एक राष्ट्रव्यापी अभियान ‘गज यात्रा’ को लांच किया गया। जिसमें हाथियों की बहुलता वाले 12 राज्यों को शामिल किया गया था। इसके साथ ही वन क्षेत्र में 15,000 वर्ग किलोमीटर की बढ़ोतरी हुई है। यह केन्द्र सरकार की पर्यावरण व वन्य जीवों के संरक्षण के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

पर्यावरण सुरक्षा विश्व का सबसे सामान्य व ज्वलनशील मुद्दा है। इस विषय पर चर्चा व परिचर्चा तो दुनिया के हर कोने में होती है, लेकिन इन चर्चा-परिचर्चा से निकले सुझावों को अमल में बहुत कम लोग ही लाते हैं। कई वर्षों से हम 5 जून के दिन पर्यावरण सुरक्षा के मुद्दे पर बहुत सजग हो जाते हैं। इतना कि रास्ते में बिखरे कूड़े, प्लास्टिक वह पॉलिथीन को अपने हाथों से उठा कर सीधा कूड़ेदान में डाल देते हैं। हमारे साथ साथ बहुत सी सरकारी वह गैर सरकारी संस्थाएं भी इस दिन पेड़ लगाने व पर्यावरण बचाने का संदेश देती हैं।

इस दिन पर्यावरण के लिए हमारी भावुकता इतनी ज्यादा होती है कि हम पर्यावरण को प्रदूषित करने वाली तमाम कंपनियों को भर भरकर गालियां देकर खूब कोसते हैं। इस दौरान हम इसके लिए जिम्मेदार सरकारों व राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और उनकी नीतियों पर भी खूब हमलावर हो जाते हैं। लेकिन चार-पांच दिन बीत जाने के बाद हमारा सारा जोश एकदम ठंडा पड़ जाता है। फिर हमें किसी पॉलिथीन, कूड़े या फैक्ट्री से उठते धुएं से कोई फर्क नहीं पड़ता। जंगल में हो रहे अंधाधुंध पेड़ों के कटने से भी हम हैरान या परेशान नहीं होते हैं। फिर हम अपनी रोजमर्रा के जीवन को ही प्राथमिकता देते हैं व पर्यावरण का मुद्दा अगले 5 जून तक हमारे लिए गौण हो जाता है।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने वर्ष 1974 में पहली बार विश्व पर्यावरण दिवस को मनाया था और यह तय किया कि हर वर्ष 5 जून के दिन विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाएगा। इस वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस “ओनली वन अर्थ -लिविंग सस्टेनेबली इन हारमोनी विद नेचर” की विषय वस्तु के साथ मनाया जा रहा है व स्वीडन इस कार्यक्रम की मेजबानी कर रहा है।

विश्व पर्यावरण दिवस को मनाते हुए हमें पूरे 48 वर्ष हो गए हैं लेकिन कुछ सवाल हमेशा से ही ज़ेहन में कौंधते रहते हैं। उदाहरण स्वरूप जब मनुष्य जीवन प्रकृति की ही उपज है तो फिर क्यों हम अपने लालच के अंधेपन में प्रकृति को समाप्त करने पर तुले हैं ? यदि हम इसी तरह पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते रहे तो क्या यह धरती आने वाली पीढ़ियों के जीवन जीने के लिए अनुकूल रहेगी? यदि महज़ पर्यावरण दिवस को मना कर ही पर्यावरण सुरक्षित हो सकता है तो पिछले 48 वर्षों में कोई बदलाव क्यों नहीं आया? क्यों आज भी हमें पर्यावरण को बचाने के लिए इस विशेष दिन की आवश्यकता है?

विश्व पर्यावरण दिवस की विषय वस्तु की प्रासंगिकता को जानने से पूर्व हमें वर्तमान समय में हमारी प्रकृति की मौजूदा स्थिति को जानने की आवश्यकता है। वर्तमान समय में पूरी दुनिया पर जो सबसे बड़ा खतरा मंडरा रहा है वह जलवायु परिवर्तन। इसके अलावा औद्योगिकरण व भूमंडलीकरण की नीतियां इत्यादि भी पर्यावरण को प्रदूषित करने में अपनी भूमिका निभा रहे हैं। धरती पर मनुष्य द्वारा आर्थिक मुनाफे की अंधी दौड़ के चलते जिस तरह औद्योगिक प्रदूषण फैलाया जा रहा है उसके कारण धरती की जलवायु लगातार परिवर्तित हो रही है, नतीजतन हमें भूमंडलीय ऊष्मीकरण (ग्लोबल वार्मिंग) का सामना करना पड़ रहा है।

भूमंडलीय ऊष्मीकरण से ओजोन परत निरंतर घटती जा रही है व सैकड़ों बीमारियां जैसे मलेरिया पीला बुखार चिकनगुनिया वह मच्छरों से फैलने वाली अनेक अनेक बीमारियां बढ़ रही हैं क्योंकि वातावरण गर्म होने से मच्छरों को अनुकूल परिस्थितियां मिलती हैं। भूमंडलीय ऊष्मीकरण से जंगल की आग या वाइल्ड फायर को भी बढ़ावा मिलता है जिस कारण वहां पर रहने वाले अनेक जीव जंतु व वनस्पति भी खतरे की जद में आ गई हैं। इसके अलावा ग्लोबल वार्मिंग का असर मौसम व कृषि पर भी पड़ता है। जैव विविधता जो जीवन चक्र व पर्यावरण को स्थिर रखने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है वह भी भूमंडलीय ऊष्मीकरण से अत्यंत खतरे में है। इन सबके अलावा सबसे अधिक खतरा उन लोगों व शहरों को है जो तटीय इलाकों में बसे हैं। क्योंकि लगातार हो रहे जलवायु परिवर्तन से ग्लेशियर सामान्य से ज्यादा गति से पिघल रहे हैं। ऐल्प्स की पहाड़ियों के ग्लेशियर इसके सबसे ताजा उदाहरण है। यदि ऐसा होता रहा तो सब सभी महासागरों के किनारे बसे करोड़ों लोगों की जान को खतरा है क्योंकि ग्लेशियर पिघलने के कारण समुंदर का जलस्तर धीरे धीरे बढ़ता जा रहा है।

एक अध्ययन के मुताबिक यदि ग्लोबल वार्मिंग इसी गति से बढ़ती रहे तो वर्ष 2030 तक सभी महासागरों का जलस्तर 20 सेंटीमीटर तक बढ़ जाएगा व कई शहर जिसमें मुंबई भी शामिल है, डूबने की कगार पर खड़े होंगे। हाल ही में आप सभी ने चेन्नई शहर की खबर तो पढ़ी ही होगी कि वहां पर पूरा का पूरा भूमिगत जल समाप्त हो चुका है यह खतरे की घंटी है जो लगातार हमारे सामने चुनौती पेश कर रही है कि अगर हम अब भी नहीं रुके तो बहुत देर हो जाएगी।

जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर हालांकि बहुत सी राष्ट्रीय व वैश्विक संस्थाएं हमेशा से ही सचेत रही हैं वह बहुत से प्रयास भी कर रही हैं लेकिन पूंजीवादी देशों की साम्राज्यवादी व औद्योगिक मुनाफे की नीतियों के चलते हुए वे हमेशा से ही असफल हो रही है। उदाहरण स्वरूप वर्ष 1996 में जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर क्योटो प्रोटोकॉल के समझौते को अधिकतर देशों ने माना लेकिन कनाडा जैसे बड़े देश ने मानने से इनकार कर दिया था। वर्ष 2015 में हुए परिस एग्रीमेंट को भी मिडिल ईस्ट के कई देशों ने मानने से इनकार कर दिया था। यूएसए ने पहले इस मुद्दे पर हस्ताक्षर किए लेकिन बाद में डोनाल्ड ट्रंप की सरकार ने इस समझौते को मानने से इंकार कर दिया था। हालांकि जो बाइडन सरकार ने वर्ष 2021 में पेरिस एग्रीमेंट से पुनः जुड़ने की बात कही है। यह साफ दर्शाता है कि दुनिया के तमाम शक्तिशाली और साम्राज्यवादी देश अपनी मनमर्जी से किसी भी अंतरराष्ट्रीय समझौते से जुड़ते हैं वह अपनी इच्छा अनुसार उस अनुबंध को तोड़ भी देते हैं। किसी भी वैश्विक संस्था में इतनी ताकत नहीं है कि वह इन शक्तिशाली देशों को पर्यावरण सुरक्षा के मुद्दे पर एकजुट होने के लिए बाध्य कर सके। जबकि दुनिया के तमाम राष्ट्र इस बात को पूरी तरह से समझने में सक्षम है कि पेरिस एग्रीमेंट ने साफ तौर पर यह समझ विकसित की थी कि जलवायु परिवर्तन में स्थिरता लाने हेतु सभी राष्ट्रों को अपना कार्बन उत्सर्जन 2 डिग्री तक कम करना होगा ताकि ग्लोबल वॉर्मिंग पर लगाम लगाई जा सके।

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पर्यावरण सुरक्षा के मुद्दे पर भारत की स्थिति और भी ज्यादा भयभीत करने वाली है। आज भारत में जलवायु को प्रभावित करने वाले मुख्य कारक जनसंख्या विस्फोट, जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, भूमि क्षरण, ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन, सॉलि़ड वेस्ट व वायु प्रदूषण इत्यादि हैं। वर्ष 2021 में वायु गुणवत्ता सूचकांक द्वारा किए गए सर्वे के अनुसार 4000 से भी ज्यादा शहरों की वायु गुणवत्ता को मालूम किया गया तो दुनिया के 50 सबसे प्रसिद्ध प्रदूषित शहरों में 47 शहर भारत के थे। यह साफ दर्शाता है कि हमारे देश के शहर जहां हम वह हमारा परिवार अपना पूरा जीवन व्यतीत कर रहे हैं वह कितने प्रदूषित हैं।

आज अब देश के किसी भी शहर में चले जाएं तो हम यह पाते हैं कि वहां सॉलि़ड वेस्ट जगह जगह खुले में बिखरा पड़ा रहता है। हमारे देश की अधिकतर जनता आजादी के 75 सालों बाद भी झुग्गी झोपड़ियों में रहने व खुले में शौच करने के लिए मजबूर हैं। ऐसे में वे अनेक बीमारियों के शिकार हो जाते हैं वह उन्हें अपना पूरा जीवन इन्हीं परिस्थितियों में व्यतीत करना पड़ता है। लेकिन हमारी सरकारें उन्हें महज एक वोट के अलावा कुछ भी नहीं समझती। इससे बड़ा दुर्भाग्य हमारे देश का कुछ भी नहीं हो सकता।

देश का कुल वन क्षेत्र 80.9 मिलियन हेक्टेयर

भारतीय वन सर्वेक्षण (एफएसआई) द्वारा तैयार ‘इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट 2021 के मुताबिक देश का कुल वन और वृक्षों से भरा क्षेत्र 80.9 मिलियन हेक्टेयर हैं जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 24.62 प्रतिशत है। 2019 के आकलन की तुलना में देश के कुल वन और वृक्षों से भरे क्षेत्र में 2,261 वर्ग किमी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसमें से वनावरण में 1,540 वर्ग किमी और वृक्षों से भरे क्षेत्र में 721 वर्ग किमी की वृद्धि पाई गई है।

जल और जलीय जीव संरक्षण

जल को साफ और सुरक्षित रखने के लिए जीवनदायिनी और पतित पावनी नमामि गंगे स्वच्छ गंगा मिशन चलाया जा रहा है। गंगा के कायाकल्प के लिए बजट में 288% से अधिक की वृद्धि की गई है। 30,853 करोड़ की अनुमानित लागत से 364 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है, जिसमें से 183 परियोजनाएं पूरी कर ली गई हैं, साथ ही शुरू भी हो चुकी हैं। वहीं जल में पाए जाने वाले जीव डॉल्फिन, कछुआ और घड़ियाल आदि के संरक्षण के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं।

पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भारत की अन्य उपलब्धियां

–दुनिया की आबादी का 17% होने का बाद भी भारत में कार्बन उत्सर्जन उत्सर्जन केवल पांच प्रतिशत है।

–गैर जीवाश्म ऊर्जा स्रोतों से स्थापित बिजली क्षमता का 40% पूरा करने का 2030 का लक्ष्य भारत ने नवंबर 2021 में ही हासिल कर लिया।

–COP 21 का लक्ष्य निर्धारित समय से 9 साल पहले हासिल किया।

–2014-2022 तक स्थापित अक्षय ऊर्जा क्षमता में 330% से अधिक की वृद्धि हुई है।

–जम्मू कश्मीर में पल्ली गांव बना भारत का पहला कार्बन न्यूट्रल पंचायत

–2014 से सौर ऊर्जा स्थापित क्षमता में 1900% की वृद्धि हुई है।

–राजस्थान के भादला में दुनिया का सबसे बड़ा सोलर पार्क चालू हुआ है।

–भारत अक्षय ऊर्जा में उभरता हुआ ग्लोबल लीडर है, विश्व की चौथी सबसे बड़ी स्वच्छ ऊर्जा क्षमता वाला देश है।

–भारत विश्व का चौथा सबसे बड़ा स्थापित पवन ऊर्जा क्षमता वाला देश है।

–विश्व की पांचवी सबसे बड़ी सौर स्थापित क्षमता वाला देश है।

भारत के पास है पर्यावरण संरक्षण के लिए कानून

भारत उन कुछ देशों में से एक है जिनके संविधानों में पर्यावरण का विशेष उल्लेख है। पर्यावरण संरक्षण में न्यायपालिका ने भी एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसके प्रयासों से स्वच्छ पर्यावरण मौलिक अधिकार का एक महत्त्वपूर्ण अंग बन गया है। भारत ने पर्यावरणीय कानूनों का व्यापक निर्माण किया है तथा हमारी नीतियां पर्यावरण संरक्षण में भारत की पहल को दर्शाती हैं।

विश्व पर्यावरण दिवस 2022 की थीम

पेड़ लगाइए, पर्यावरण बचाइए- यह महज एक वाक्यांश नहीं है। मानव समाज और सभी देशवासियों की इस पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी है। इस वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस 2022 दुनिया भर में ‘ओनली वन अर्थ’ की थीम के साथ मनाया जा रहा है, जो हमें याद दिलाती है कि यह ग्रह हमारा एकमात्र घर है और हमें इसके प्रति कृतज्ञ होना चाहिए और इसके कल्याण और समृद्धि के लिए कार्य करना चाहिए।

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