Monday, May 27, 2024
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बीएचयू : भारत की देव भूमि उत्तराखंड से की गयी अनोखे कवक की खोज

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बीएचयू : भारत की देव भूमि उत्तराखंड से की गयी अनोखे कवक की खोज

· वनस्पति विज्ञान विभाग,बीएचयू के शोधकर्ताओं की टीम को एक बड़ी कामयाबी हाथ लगी है 

· शोधकर्ताओ ने खोजा नियोकमलोमाइसीज इंडिकस नामक कवक की एक नयी अनोखी वंश (जीनस) 

बीएचयू के वनस्पति विज्ञान विभाग के वरिष्ठ सहायक प्राध्यापक (डॉ. राघवेन्द्र सिंह) एवं उनकी शोधकर्ताओं की टीम (संजय, संजीत, विनय, बालमुकुंद); डॉ. पारस नाथ सिंह, वैज्ञानिक, आघारकर अनुसंधान संस्थान, पुणे; डॉ. शंम्भू कुमार, वरिष्ठ वैज्ञानिक, केरला वन अनुसंधान संस्थान, केरल को बड़ी सफलता मिली है। शोधकर्ताओं की टीम ने उत्तराखण्ड से एकत्र किए नमूने से कवक की एक नये वंश की खोज की है।

जुलाई 2019 में सर्वेक्षण के दौरान उत्तराखंड से बरगद (वैज्ञानिक नाम: फाइकस बेंगालेन्सिस) की कवक द्वारा रोग ग्रसित पत्तियों के नमूने को इकट्ठा किया गया। प्रयोगशाला मे इस कवक को उगाकर एवं इसका गहन अध्ययन करने के पश्चात इस नई वंश के बारे में पूरी जानकारी इकट्ठा किया गया। यह खोज आधुनिक पॉलीफेजिक तकनीक का उपयोग करके किया गया है जो जीवों की पहचान करने में सबसे अधिक उपयुक्त और अहम मापदंड माना जाता है।

इस कवक के वंश का नाम नियोकमलोमाइसीज के नाम से नामित किया गया है जो भारत में कवक विविधता क्षेत्र में उत्कृष्ठ कार्य करने वाले विश्व प्राख्यात वैज्ञानिक, प्रोफ़ेसर (डॉ.) कमल (दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर, उत्तरप्रदेश) के नाम पर रखा गया है, एवं इसका जाति का नाम इंडिकस, इंडिया के नाम पर रखा गया है। भारत मे कवकों की विविधता के क्षेत्र में प्रोफ़ेसर कमल का योगदान सबसे अधिक रहा हैI इन्होने अब तक कवकों की अनेकों नई जातियों एवं प्रजातियों की खोज कर विश्व पटल पर उत्तकृष्ट योगदान दिया है, तथा इस क्षेत्र में शोधकार्य करने वाले वैज्ञानिकों के लिये सदैव प्रेरणा के श्रोत रहे हैं।

वैश्विक जलवायु परिवर्तन दुनिया भर में जैव विविधता को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है। वैज्ञनिक शोधों के अनुसार यदि जैव विविधता की पहचान और संरक्षण के लिए समर्पित प्रयास नहीं किए गए तो मानव जाति के समक्ष ऐसी स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है, जहां जीवों के तमाम प्रकार की जातियाँ एवं प्रजातियाँ गुमनाम एवं हमेशा के लिए विलुप्त हो सकते हैं

शोधकर्ताओं की माने तो यह खोज पूरे विश्व के लिए अहम माना जा रहा है, क्योंकि नये-नये कवको से नये-नये एंटीबायोटिक दवाओं तथा अन्य महत्वपूर्ण मिश्रण (मेटाबोलाइट) से अलग-अलग प्रकार के कैंसर इत्यादि की दवाओं की खोज की जा रही है। अतः यह खोज जैव विविधता की पहचान और संरक्षण के लिए समर्पित एक सार्थक प्रयास है। जैव तकनीकी के क्षेत्र में शोध कार्य करने वाले वैज्ञानिकों एवं जैव नियंत्रण इंडस्ट्रीज में कार्य करने वाले, पादप रोगों से संबंधित वैज्ञानिक, एंटीफंगल कंपाउंड बनाने में रुचि रखने वाले वैज्ञानिक के लिए हमारा यह शोध कार्य बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। फार्मास्यूटिकल्स के उत्पादन के लिए कवक एक संभावित सोने की खान है।

डॉक्टर सिंह के अनुसार,

“यह वैश्विक संरक्षण लक्ष्यों में कवक को शामिल करने का समय है।”

यह शोध कार्य एक बहुत ही प्रतिष्ठित पत्रिका (जरनल) फाइटोटैक्सा (Phytotaxa) में 3 नवम्बर २०२२ मे प्रकाशित हुआ है।

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