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मख भूमि मखौड़ा धाम में पौराणिक मेला आज तैयारियां पूरी

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मख भूमि मखौड़ा धाम में पौराणिक मेला आज तैयारियां पूरी

परशुरामपुर । अयोध्या व कौशल का नाम किसी से छिपा नहीं है। भगवान श्रीराम का जीवन चरित्र आज न विश्व में मानवता मे कहा जाता है कि मख से राम, राम से अयोध्या तब जग में उल्लास। भगवान श्रीराम का जन्म अयोध्या में हुआ था लेकिन श्रीराम की उद्भव स्थली मख-भूमि मखौड़ा धाम माना जाता है अयोध्या से ज्यादा पवित्र स्थान मख-भूमि मखौड़ा धाम को मान्यताहै।


त्रेता युग में चक्रवर्ती सम्राट परम प्रतापी राजा दशरथ अयोध्या के राजा थे। उनके तीन रानियां थी कौसल्या, कैकेयी और सुमित्रा। राजा दशरथ बूढ़े हो चले थे चौथेपन में उनको कोई पुत्र नहीं था। और इस बात का उनको एक दिन बहुत दुःख हुआ जो कि राम चरित मानस के बाल कांड में उल्लिखित है।
एक बार भूपति मन माहीं। भै गलानि मोरे सुत नाहीं।।
गुरु गृह गयऊ तुरत महिपाला। चरन लागि करि विनय बिसाला।।चौ
अर्थात, महाराजा दशरथ को एक बार मन ही मन बहुत गलानि हुई कि मेरे कोई पुत्र नहीं। और इस बात से चिंतित होकर वह तुरंत अपने राज गुरु वशिष्ट के घर गए। और पैर पकड़कर विनती करने लगे। तब गुरु वशिष्ट ने राजा दशरथ को पुत्र कामेष्ठि यज्ञ करवाने की सलाह दी। तब यज्ञ को करवाने के लिए पूरे भारतवर्ष में पवित्र जमीन खोजी गई, लेकिन पवित्र जमीन कहीं नहीं मिला तब जाकर अयोध्या से वर्तमान में लगभग 17 कि.मी. दूर मखौड़ा में ऐसी पावन मख भूमि मिली। तब गुरु वशिष्ट ने यज्ञ करवाने के लिए श्रृंगी ऋषि को बुलवाया। जो कि मखौड़ा धाम से उनका आश्रम लगभग 15 कि.मी. की दूरी पर श्रृंगीनारी में स्थित था। और इसका उल्लेख रामचरित मानस के बालकांड में मिलता है।
श्रृंगी ऋषिहि बशिष्ट बोलावा। पुत्र काम शुभ जग्य करावा।।
भगति सहित मुनि आहुति दीन्हें। प्रगटे अगिनि चरू कर लीन्हें।।चौ
अर्थात, राजगुरु वशिष्ट जी ने श्रृंगी ऋषि को बुलवाया और उनसे शुभ पुत्र कामेष्टि यज्ञ करवाया। मुनि के भक्ति सहित आहुतियां देने पर अग्निदेव हाथ में चरु यानि खीर लेकर प्रकट हुए। जिसको राजा दशरथ की तीनो रानियों ने ग्रहण किया और उनको फिर चार पुत्रों राम, भारत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न की प्राप्ति हुई। इस प्रकार से चौथेपन में राजा दशरथ को चार पुत्र की प्राप्ति हुई। और अयोध्या के राजमहल में उनकी किलकारियां गूंजने लगी। तब से मख-भूमि मखौड़ा धाम श्रीराम की उद्भव स्थली के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
ऐसा कहा जाता है कि त्रेता युग में जो राजा दशरथ के द्वारा पुत्र कामेष्टि यज्ञ कराया गया, जिसमें आहुति के लिए घृत नाले से घी अयोध्या से सीधे मखौड़ा धाम यज्ञ स्थल तक पहुँचा था। जो कि वर्तमान में जिले कि सीमा घघौवा पुल से सटा हुआ है। हैदराबाद, सिकंदरपुर, चौरी, करिगहना से जमौलिया के रास्ते मखौड़ा धाम तक मौजूद है।
धार्मिक ग्रंथों में ऐसी मान्यता है कि मखौड़ा में यज्ञ करने से पहले कोई नदी नहीं थी तब महर्षि विभांडक के पुत्र श्रृंगी ऋषि ने सरस्वती देवी का आवाहन मनोरामा के नाम से किया था। इससे वहाँ मनोरामा नदी (सरस्वती) की उत्पत्ति हुई। एक बार उत्तर कौशल में सम्पूर्ण भारत के ऋषि मुनियों का सम्मलेन हुआ था जिसकी अगुवाई ऋषि उद्दालक ने की थी। उनका भी तप स्थल मखौड़ा के समीप में था। उद्दालक ऋषि के पुत्र नचिकेता ने अपने नचिकेता पुराण में माता मनोरामा के महात्म्य का वर्णन इस प्रकार किया है। इस श्लोक के माध्यम से समझाया
अन्य क्षेत्रे कृतं पापं, काशी क्षेत्रे विनश्यति।
काशी क्षेत्रे कृतं पापं, प्रयाग क्षेत्रे विनश्यति।
प्रयाग क्षेत्रे कृतं पापं, मनोरमा विनश्यति।
मनोरमा कृतं पापं, ब्रजलेपो भविष्यति।
अर्थात, किसी भी क्षेत्र में किया गया पाप काशी में स्नान करने से नष्ट हो जाता है। काशी में किया गया पाप प्रयाग में स्नान करने से नष्ट हो जाता है तथा प्रयाग में किया गया पाप मनोरामा में स्नान करने से नष्ट हो जाता है। लेकिन मनोरमा में किया गया पाप बज्र लेप के समान घातक होता है।
मनोरमा (सरस्वती) को ब्रह्मा जी की पुत्री माना जाता है। और पुराणों में इस नदी को सरस्वती की सातवीं धारा भी कहा गया है। मनोरमा नदी के बारे में यह जन श्रुति है कि जहाँ मन रमे वही मनोरमा होता है। और जहाँ मन का माँगा वर मिले उसे ही मनवर कहा जाता है। यज्ञ को मख कहते हैं इसलिए यहाँ का नाम मखक्षेत्र हुआ। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार मनोरमा माता के बारे में कहा गया है कि ,
मखस्थानं महापुण्यं यत्रपुण्या मनोरमा।
नदी बहति पापघ्नी भुक्ति-मुक्ति प्रदायिका।।
वर्तमान में यही स्थान मखभूमि मखौड़ा धाम के नाम से प्रसिद्ध हुआ। मखौड़ा धाम में अयोध्या की चौरासी कोसी परिक्रमा का पहला पड़ाव स्थल है। चैत्र मास की पूर्णिमा के दिन यहाँ हर साल मेला लगता है बड़ी संख्या में संत व गृहस्थ यहाँ से आज भी हर वर्ष प्रतिपदा के दिन यात्रा प्रारम्भ करते हैं। यह यात्रा 84 कोसी इसलिए रखी गई कि 84 लाख योनियों में भटकने के बाद मनुष्य का जन्म होता है। इस यात्रा को करने वाला मोक्ष की प्राप्ति करता है। और उसे जीवन मरण के बंधन से मुक्ति मिल जाती है।
आज भी यह मान्यता है कि जो लोग इस पावन मख भूमि में माता मनोरमा के तट पर स्थित क्षेत्र में हवन, यज्ञ आदि संस्कार कराते हैं। तो उनके सारे मनोरथ सफल हो जाते हैं। मखौड़ा धाम में आज भी पुत्रेष्टि यज्ञ वैशाख शुक्ल पक्ष के अक्षय तृतीया के दिन हर साल होता है। यह यज्ञ सात दिन का होता है। अभी भी मखौड़ा में बहुत दूर-2 जैसे- गुजरात, बंगाल, पूना, दिल्ली आदि अलग-2 राज्यों से भक्तजन आते हैं। और आज भी जिसको पुत्र नहीं होता उनको यज्ञ होने के बाद खीर का प्रसाद दिया जाता है फलस्वरुप जिसके पुत्र नहीं रहता उनको पुत्र की प्राप्ति होती है। जिसके चलते आज भी लोग आये दिन पवित्र मास में मंदिर में भंडारे आदि का आयोजन कराते रहते हैं। इसी क्रम में लोक कल्याण हेतु साधू-संतों द्वारा बीते वर्ष कार्तिक पूर्णिमा से सतत बारह वर्षों तक चलने वाला अखण्ड राम नाम का जाप प्रारम्भ हुआ जो कि निरंतर चल रहा है।मंदिर के महंत सुर्य दास वैदिक ने कहा कि हर साल मेला आयोजन किया जाता दुर दुर से आकर प्रसाद ग्रहण करते है।

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