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राष्ट्र निर्माण में शिक्षक की भूमिका महत्वपूर्ण: प्रो. डी. आर. साहू

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गोरखपुर

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राष्ट्र निर्माण में शिक्षक की भूमिका महत्वपूर्ण: प्रो. डी. आर. साहू

गोरखपुर : एक शिक्षक को शिक्षण और अनुसंधान के बाद अपने समाज के लिए भी उत्तरदायी होना होगा। राष्ट्र निर्माण में शिक्षक की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में कुछ बाधक तत्व हैं, जैसे पहचान, निर्माण, संस्कृति, भाषा इत्यादि। यह तत्व हमें जोड़ते भी हैं और हममें द्वंद भी पैदा करते हैं। राष्ट्र निर्माण के लिए हमें सबसे पहले अपने अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाना होगा। उसके बाद हमें राज्य निर्माण, समुदाय निर्माण, क्षमता निर्माण, लोकतंत्र निर्माण, नागरिक निर्माण, सामाजिक पूंजी निर्माण, अपनी सैन्य क्षमता को बढ़ाकर, विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों का क्रियान्वयन करके, शिक्षा तथा स्वास्थ्य से संबंधित सुविधा को बढ़ाकर राष्ट्र निर्माण को मजबूती प्रदान कर सकते हैं।

उक्त वक्तव्य दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय गोरखपुर के यूजीसी-एचआरडी सेंटर द्वारा आयोजित चौथे फैकल्टी इंडक्शन प्रोग्राम में लखनऊ विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के अध्यक्ष एवं भारतीय समाजशास्त्र परिषद के पूर्व महासचिव प्रोफेसर डी.आर.साहू ने राष्ट्र निर्माण में शिक्षकों की भूमिका विषय पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए दिया।

प्रथम सत्र में दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के वनस्पति विभाग के प्रोफेसर अनिल कुमार द्विवेदी के द्वारा आधुनिक व्यवसाय एवं स्वास्थ्य के मुद्दे विषय पर व्याख्यान प्रस्तुत किया गया। उन्होंने अपने उद्बोधन में यह बताया कि किस तरह से हम अपने नौकरी तथा व्यवसाय को इतना तवज्जो देते हैं कि हम अपने स्वास्थ्य पर ध्यान देना भूल जाते हैं। उन्होंने बताया कि कोविड की त्रासदी ने किस तरह मनुष्य को सर्वव्यापी बना दिया है, क्योंकि ऑनलाइन व्यवस्था के कारण हम एक साथ कई जगह उपस्थित होकर अपने कार्य को अंजाम दे सकते हैं।

द्वितीय सत्र में लखनऊ विश्वविद्यालय के अंग्रेजी और आधुनिक यूरोपियन भाषाओं के प्रोफेसर हरि नारायण प्रसाद के निर्देशन में सेमिनार प्रस्तुति सत्र का आयोजन किया गया जिसमें क्रमश: डॉ आभा द्विवेदी, डॉ अभिमन्यु पाठक, डॉ अजय कुमार त्रिपाठी, अम्मार अशरफ, डॉक्टर अमृता जायसवाल, डॉक्टर आनंद कुमार पांडे, अनिल कुमार तथा अनिल कुमार वर्मा ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए।

कार्यक्रम समन्वयक एवं अंग्रेजी विभाग के अध्यक्ष प्रो. अजय कुमार शुक्ला ने अतिथियों का स्वागत किया और बताया कि 30 दिनों तक चलने वाले इस गुरु दक्षता कार्यक्रम में यूजीसी के मानक के अनुरूप विभिन्न विषयों पर देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के विशेषज्ञों द्वारा व्याख्यान आयोजित कराया गया। आगामी 12 जून को इस कार्यक्रम का समापन होना है। इस दौरान माइक्रो टीचिंग एवं सेमिनार के सत्र भी आयोजित किए गए।

निदेशक प्रो. रजनीकांत पाण्डेय ने कार्यक्रम का ऑनलाइन अवलोकन किया। सह समन्वयक डॉ. मनीष पाण्डेय ने आभार ज्ञापित किया।

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गुरू ब्रह्मा गुरू विष्णु, गुरु देवो महेश्वरा गुरु साक्षात परब्रह्म, तस्मै श्री गुरुवे नम: अर्थात गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है और गुरु ही भगवान शंकर है। गुरु ही साक्षात परब्रह्म है। ऐसे गुरु को मैं प्रणाम करता हूं। इन शब्दों को समझने के लिए गुरुकुल युग में प्रवेश करना होगा। समय परिवर्तन होने के बाद गुरु शब्द को बोलने का नजरिया और गुरुओं के प्रति भावना में परिवर्तन भी हो गया। राष्ट्र निर्माण में समर्पित गुरुओं ने राष्ट्र के विकास में अहम योगदान दिया है। इस विषय पर जरुर अपने विचारो का लेख के माध्यम से सार्वजानिक करूंगा। हम शिक्षक दिवस मना रहे है। शिक्षक दिवस पर राष्ट्र को समर्पित, सभी शिक्षको को हार्दिक बधाई।

शिक्षक का दर्जा समाज में हमेशा से ही पूजनीय रहा है। कोई उसे गुरु कहता है, कोई शिक्षक कहता है, कोई आचार्य कहता है, तो कोई अध्यापक या टीचर कहता है ये सभी शब्द एक ऐसे व्यक्ति को चित्रित करते हैं, जो सभी को ज्ञान देता है, सिखाता है और जिसका योगदान किसी भी देश या राष्ट्र के भविष्य का निर्माण करना है। सही मायनो में कहा जाये तो एक शिक्षक ही अपने विद्यार्थी का जीवन गढ़ता है। शिक्षक ही समाज की आधारशिला है। एक शिक्षक अपने जीवन के अन्त तक मार्गदर्शक की भूमिका अदा करता है और समाज को राह दिखाता रहता है, तभी शिक्षक को समाज में उच्च दर्जा दिया जाता है।

माता-पिता बच्चे को जन्म देते हैं। उनका स्थान कोई नहीं ले सकता, उनका कर्ज हम किसी भी रूप में नहीं उतार सकते, लेकिन शिक्षक ही हैं जिन्हें हमारी भारतीय संस्कृति में माता-पिता के बराबर दर्जा दिया जाता है क्योंकि शिक्षक ही हमें समाज में रहने योग्य बनाता है। इसलिये ही शिक्षक को समाज का शिल्पकार कहा जाता है। गुरु या शिक्षक का संबंध केवल विद्यार्थी को शिक्षा देने से ही नहीं होता बल्कि वह अपने विद्यार्थी को हर मोड़ पर उसको राह दिखाता है और उसका हाथ थामने के लिए हमेशा तैयार रहता है। विद्यार्थी के मन में उमड़े हर सवाल का जवाब देता है और विद्यार्थी को सही सुझाव देता है और जीवन में आगे बढ़ने के लिए सदा प्रेरित करता है।

एक शिक्षक या गुरु द्वारा अपने विद्यार्थी को स्कूल में जो सिखाया जाता है या जैसा वो सीखता है वे वैसा ही व्यवहार करते हैं। उनकी मानसिकता भी कुछ वैसी ही बन जाती है जैसा वह अपने आसपास होता देखते हैं। इसलिए एक शिक्षक या गुरु ही अपने विद्यार्थी को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। सफल जीवन के लिए शिक्षा बहुत उपयोगी है जो हमें गुरु द्वारा प्रदान की जाती है। विश्व में केवल भारत ही ऐसा देश है जहाँ पर शिक्षक अपने शिक्षार्थी को ज्ञान देने के साथ-साथ गुणवत्तायुक्त शिक्षा भी देते हैं, जोकि एक विद्यार्थी में उच्च मूल्य स्थापित करने में बहुत उपयोगी है। जब अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश का राष्ट्रपति आता है तो वह भी भारत की गुणवत्तायुक्त शिक्षा की तारीफ करता है।
किसी भी राष्ट्र का आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विकास उस देश की शिक्षा पर निर्भर करता है। अगर राष्ट्र की शिक्षा नीति अच्छी है तो उस देश को आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता अगर राष्ट्र की शिक्षा नीति अच्छी नहीं होगी तो वहाँ की प्रतिभा दब कर रह जायेगी बेशक किसी भी राष्ट्र की शिक्षा नीति बेकार हो, लेकिन एक शिक्षक बेकार शिक्षा नीति को भी अच्छी शिक्षा नीति में तब्दील कर देता है। शिक्षा के अनेक आयाम हैं, जो किसी भी देश के विकास में शिक्षा के महत्व को अधोरेखांकित करते हैं।

एक शिक्षक द्वारा दी गयी शिक्षा ही शिक्षार्थी के सर्वांगीण विकास का मूल आधार है। शिक्षकों द्वारा प्रारंभ से ही पाठ्यक्रम के साथ ही साथ जीवन मूल्यों की शिक्षा भी दी जाती है। शिक्षा हमें ज्ञान, विनम्रता, व्यवहारकुशलता और योग्यता प्रदान करती है। शिक्षक को ईश्वर तुल्य माना जाता है। आज भी बहुत से शिक्षक शिक्षकीय आदर्शों पर चलकर एक आदर्श मानव समाज की स्थापना में अपनी महती भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। लेकिन इसके साथ-साथ ऐसे भी शिक्षक हैं जो शिक्षक और शिक्षा के नाम को कलंकित कर रहे हैं, ऐसे शिक्षकों ने शिक्षा को व्यवसाय बना दिया है, जिससे एक निर्धन शिक्षार्थी को शिक्षा से वंचित रहना पड़ता है और धन के अभाव से अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ती है। आधुनिक युग में शिक्षक की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण है। शिक्षक वह पथ प्रदर्शक होता है जो हमें किताबी ज्ञान ही नहीं बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाता है।

आज के समय में शिक्षा का व्यवसायीकरण और बाजारीकरण हो गया है। शिक्षा का व्यवसायीकरण और बाजारीकरण देश के समक्ष बड़ी चुनौती है। पुराने समय में भारत में शिक्षा कभी व्यवसाय या धंधा नहीं थी। गुरु एवं शिक्षक ही वो हैं जो एक शिक्षार्थी में उचित आदर्शों की स्थापना करते हैं और सही मार्ग दिखाते हैं। एक शिक्षार्थी को अपने शिक्षक या गुरु प्रति सदा आदर और कृतज्ञता का भाव रखना चाहिए। किसी भी राष्ट्र का भविष्य निर्माता कहे जाने वाले शिक्षक का महत्व यहीं समाप्त नहीं होता क्योंकि वह ना सिर्फ हमको सही आदर्श मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं बल्कि प्रत्येक शिक्षार्थी के सफल जीवन की नींव भी उन्हीं के हाथों द्वारा रखी जाती है।

हम भली भांति जानते हैं कि पुरातन काल में भारतीय गुरुकुलों में जो शिक्षा प्रदान की जाती थी, वह निश्चित रूप से बच्चों का समग्र विकास करने वाली ही थी। इतना ही नहीं वह शिक्षा विश्व स्तरीय ज्ञान का द्योतक भी थी, इसलिए विश्व के कई देश भारत के शिक्षालयों में ज्ञान और विज्ञान की उच्च स्तरीय शिक्षा ग्रहण करने आते थे। हमें अब उसी शिक्षा पद्धति की ओर कदम बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। अभी भारत सरकार ने इस दिशा में सार्थक कदम बढ़ाया है। यह शिक्षा इंडिया को भारत बनाने में सकारात्मक सिद्ध होगी, यह संकेत दिखाई देने लगे हैं। शिक्षको को भी चाहिए कि वह इस नीति को आत्मसात कर बच्चों के भविष्य को वह दिशा प्रदान करें जो विश्व के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है। क्योंकि शिक्षक संस्कारों का एक प्रकाश स्तंभ है, जो विद्यार्थियों के जीवन में ज्ञान की किरणें फैलाता है।शिक्षा वही है, जो जीवन में नैतिक मूल्यों का विकास करे, इसके साथ ही सामाजिक और राष्ट्रीय दायित्वों के प्रति कर्तव्य पालन का बोध कराए। राष्ट्रीय दायित्व का बोध केवल इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों के अध्ययन और अध्यापन से ही हो सकता है। वर्तमान में यह देखने में आ रहा है कि हम शिक्षा तो ग्रहण कर रहे हैं, लेकिन पिछले पाठों को भूलते जा रहे हैं। इसका एक मूल कारण हमारे देश की शिक्षा नीति है। आज से 73 वर्ष पूर्व जब हमारा देश स्वतंत्र हुआ, तब हमारी शिक्षा नीति को भारतीय बनाने पर जितना जोर दिया जाना चाहिए, उतना नहीं दिया गया। शिक्षा के क्षेत्र में हम पूरी तरह से भटक गए। इसलिए आज की पीढ़ी में न तो भारतीय संस्कारों का बोध है और न ही नैतिकता के जीवन मूल्य ही हैं।शिक्षा वही सार्थक होती है, जो अपने देश के लिए चरित्रवान समाज और सकारात्मक सोच का निर्माण कर सके। भारत में अभी तक जो शिक्षा दी जा रही थी, उसमें भारत के मानबिन्दुओं का उपहास उड़ाया गया और विदेशियों का गुणगान किया गया। इसमें ऐसे भी विदेशी शामिल किए गए, जिन्होंने भारतीयता को नष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ऐसे चरित्रों के पठन पाठन से ही आज की पीढ़ी भारत के संस्कारों से दूर होती जा रही है। लेकिन हमारे देश के शिक्षकों को भी यह समझना चाहिए कि छात्रों को क्या शिक्षा दी जाए।हमारे देश में शिक्षाविद डॉ. राधाकृष्णन के जन्म दिवस को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है, लेकिन आज के विद्यार्थियों को यह भी नहीं पता होगा कि डॉ. राधाकृष्णन जी के जीवन शिक्षकों के एक आदर्श है, एक पाथेय है। जिस पर चलकर हम शिक्षक की वास्तविक भूमिका का सही ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। सन 1962 में जब डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारत के राष्ट्रपति बने, तब उनके कुछ विद्यार्थी उनके पास उनका जन्मदिन मनाने की स्वीकृति लेने गए।

उस समय राधाकृष्णन जी ने कहा मेरा जन्मदिन मनाने के बजाय 5 सितंबर शिक्षक दिवस के रुप में मनाया जाए तो मुझे अति प्रसन्नता एवं गर्व महसूस होगा। डॉ. राधाकृष्णन का शिक्षकों के बारे में मत था कि शिक्षक वह नहीं जो छात्र के दिमाग में तथ्यों को जबरन ठूंसे। वास्तविक शिक्षक तो वह है जो छात्र को आने वाले कल की चुनौतियों के लिए तैयार करे। आज की शिक्षा चुनौतियों को ध्यान में रखकर नहीं, बल्कि जीवन में पैसे कैसे कमाए जाते हैं, इसे ही ध्यान में रखकर दी जा रही है। कहा जा सकता कि जो शिक्षा दे रहे हैं, वे इसे व्यवसाय मान रहे है और जो ग्रहण कर रहे वे इसे आय प्राप्त करने का साधन। ऐसी शिक्षा चरित्र का निर्माण नहीं कर सकती। इसलिए शिक्षकों को चाहिए कि वे छात्रों को ऐसी शिक्षा भी दें, जो उनके जीवन को संवार सके। क्योंकि जिस शिक्षा से संस्कारों का निर्माण होता है, वही जीवन के काम आती है जिनकी याद में हम शिक्षक दिवस मनाते हैं, वे चाहते थे कि शिक्षा विद्यार्थियों को सही और गलत का बोध कराने वाली होना चाहिए। वास्तव में डॉ. राधाकृष्णन जी भारतीय संस्कृति के संवाहक थे। उन्होंने अपने लेखों और प्रबोधन के माध्यम से भारतीय संस्कृति की सुगंध को हमेशा ही प्रवाहित किया। एक बार शिकागो विश्वविद्यालय में उनको धर्म शास्त्रों पर व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया जहां उन्होंने भारत के ज्ञान के बारे में प्रेरणास्पद उद्बोधन दिया। इस उद्बोधन के बाद डॉक्टर राधाकृष्णन जी की ख्याति वैश्विक धरातल पर और भी बढ़ती चली गई और इसी कारण उन्हें भारत एवं अन्य देशों की प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया। उसके बाद विश्व में भारत का गौरव गान होने लगा। उनके भाषणों में सिर्फ भारत ही होता था। वह जब बोलते थे तब ऐसा लगता था कि यही भारत की वाणी है। वह वास्तव में भारत रत्न थे। इसलिए भारत सरकार ने सन 1954 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया।

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शिक्षा अत्यंत ही अनमोल एवं मूल्यवान है। जिससे विद्यार्थी अपने स्वयं के ज्ञान का विस्तार तो करता ही है, साथ ही देश को भी मजबूत करता है। डॉ. राधाकृष्णन ने अपनी पुस्तक आधुनिक भारत के राजनीतिक विचारक में भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में शिक्षकों और शिक्षा के महत्व को बताया है। डॉक्टर राधाकृष्णन के अनुसार शिक्षक देश के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और इसी वजह से अधिक सम्मान के योग्य होते हैं। भारत में सनातन काल से गुरु और शिष्य का संबंध समर्पण की भावना से परिपूर्ण रहा है। गुरु देश के भविष्य को संवारता है। वर्तमान पीढ़ी देश का भविष्य है। गुरु जैसे संस्कार युवा पीढ़ी को देंगे वैसा ही देश का चरित्र बनेगा।

 

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