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धूमधाम से हुआ छात्रावास शताब्दी समारोह का उद्घाटन

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धूमधाम से हुआ छात्रावास शताब्दी समारोह का उद्घाटन

पूर्वछात्रों कर्मचारियों तथा प्रशासनिक संरक्षकों का किया गया  सम्मान

बीएचयू : किसी भी शिक्षण संस्थान की विरासत उसके पूर्व छात्रों की गौरवशाली परम्परा होती है, जो संस्थान जितना अधिक अपने पूर्व छात्रों को अपने से जोडकर रखता है वह उतना ही अधिक समृद्ध होता है| भारतीय गुरुकुल परम्परा की इसी बात को ध्यान में रखते हुये रुईया छात्रावास (संस्कृत ब्लाक) के द्वारा अपने सौ वर्ष पूरे होने पर “शताब्दी समारोह” के रूप में  द्वि-दिवसीय  पूर्वछात्र-समागम  के कार्यक्रम का आज उद्घाटन मालवीय मूल्य अनुशीलन केन्द्र में किया गया| रुइया छात्रावास का निर्माण मुंबई के उद्योगपति रुइया परिवार के द्वारा किया गया था| यह काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का प्रथम व सबसे प्राचीन छात्रावास है|

पहले यह रुइया के ही नाम से था जिसमे मेडिकल, संगीत व संस्कृत के छात्र एक साथ रहा करते थे, बाद मे इसको दो भाग में बांटकर संस्कृत ब्लाक और मेडिकल ब्लाक कर दिया गया| २०२२ में यह अपना शताब्दी वर्ष विभिन्न प्रकार के आयोजनों के द्वारा धूमधाम से मना रहा है|

आज शताब्दी कार्यक्रम के उद्घाटन के अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. देवी प्रसाद Triapthi ने बताया कि आने वाला समय संस्कृत व संस्कृति का होगा, सम्पूर्ण राष्ट्रीय शिक्षनिति संस्कृत के आधार पर ही विकसित की गयी है| सम्पूर्ण विश्व संस्कृत में छिपे भारतीय ज्ञान-विज्ञान के तत्वों को जानने, समझने व अनुसंधान के लिये अग्रसर हो रहा है| उन्होने संस्कृत में रोजगार की व्यापक सम्भावनाओं के उपर भी प्रकाश डाला|

छात्रों को अध्यापन के साथ-साथ छात्रावासीय कार्यो व गतिविधियों में  सक्रिय सहभागिता भी व्यक्तित्व का विकास करती है| छात्रावास में सिर्फ़ रहना ही नहीं होता, अपितु अलग-अलग स्थानों व प्रदेशों से आये हुये अपरिचित छात्रों के साथ प्रेम-मित्रता करना, सुख-दु:ख में एक दुसरे की मदद करना, नेतृत्व  क्षमता व विभिन्न गतिविधियों के मध्यम से उनके सम्पूर्ण व्यक्तित्व का विकास होता है| वस्तुत: छात्रावासीय जीवन में एक सम्पूर्ण समग्र व्यवस्थित  जीवन जीने की शिक्षा मिलती है| उक्त बातें सारस्वत अतिथि के रूप में उपस्थित स्म्पूर्णान्द् संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. राजाराम शुक्ल ने कही|

सेना के दो प्रमुख तत्व होते हैं लक्ष्य और अनुशासन| लक्ष्य को केन्द्रित करके, निश्चित योजना व निश्चित समय में सफ़लता पूर्वक कार्य को पूर्ण करना एक बहुत बडी कला होती है, जो हर छात्र के पास होनी चाहिये तभी वह अपने लक्ष्य के प्रति सफ़ल हो सकता है| बिना निश्चित लक्ष्य के सफलता नहीं मिलती है| उक्त बातें बतौर विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित भारतीय थल सेना के धर्मशिक्षक डा. दिग्विजय पाठक ने व्यक्त की| उन्होने कहा कि लक्ष्य की तरह अनुशासन भी आवश्यक है, क्योंकि बिना अनुशासन  विद्या या ज्ञान प्राप्त होना असम्भव है|

प्रत्येक छात्र को अपने जीवन में अनुशासन को धारण करना चाहिये

अध्यक्षता करते हुये कुलगुरु प्रो. विजय कुमार शुक्ल ने शताब्दी समारोह के आयोजन पर हर्ष व्यक्त करते हुये कहा कि महामना की बगिया के पूर्व छात्रों की विशाल परम्परा है, जो अपने विभिन्न प्रकार के योगदानों द्वारा विश्वविद्यालय को गौरवान्वित कर रहे है|

उन्होने पूर्वछात्रों को संकाय की विभिन्न प्रकार की गतिविधियों-समितियों  से जोडने पर बल दिया| पूर्वछात्र के रूप में अपना छात्रावासीय अनुभव सुनते हुये डा. मुनीश कुमार मिश्र ने मेस समस्या , सडक व ग्राउन्ड की समस्या, कमरों की समस्या, भारत रत्न अभियान आदि के बारे  में बताया| द्वितीय सत्र में छात्रावास के पूर्व व वर्तमान कर्मचारियों तथा प्रशासनिक संरक्षकों का सम्मान किया गया|

कार्यक्रम का प्रारम्भ दीप प्रज्वलन व महामना की प्रतिमा पर माल्यार्पण के साथ हुआ| स्वागत भाषण व विषय प्रवर्तन संरक्षक प्रो. सरोज कुमार पाढी ने किया, धन्यवाद ज्ञापन छात्र सलाहकार प्रो. शंकर कुमार मिश्र ने किया था कार्यक्रम का संयोजन व संचालन प्रशासनिक संरक्षक प्रो. शत्रुघ्न त्रिपाठी ने किया|

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