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Friday, December 9, 2022

बीएचयू  : ‘‘श्री काशी विश्वनाथ धाम एवं श्रीराम जन्मभूमि’’ पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन

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‘श्री काशी विश्वनाथ धाम एवं श्रीराम जन्मभूमि’’ पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन

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बीएचयू  : ‘‘श्री काशी विश्वनाथ धाम एवं श्रीराम जन्मभूमि’’ पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन

बीएचयू  : वैदिक विज्ञान केन्द्र, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय एवं केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के संयुक्त तत्त्वावधान में शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार की ‘‘बौद्धिक विरासत परियोजना’’ के अन्तर्गत वाराणसी में ‘‘श्री काशी विश्वनाथ धाम एवं श्रीराम जन्मभूमि’’ पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन दिनांक 25-11-2022 (शुक्रवार) को प्रातः 10:30 बजे से वैदिक विज्ञान केन्द्र के सभागार में किया गया। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि उत्तर प्रदेश प्रभारी, प्रधानमंत्री कार्यालय के श्रीमान् सुनील ओझा ने कहा कि इतिहास में हम देखते है कि पन्द्रहवीं, सोलहवीं शताब्दी और उसके बाद हिन्दू धर्म संस्कृति पर अनेक आघात हुए लेकिन साथ ही अहिल्याबाई होलकर जैसे धार्मिक, सांस्कृतिक पुरोधाओं ने भारतीय संस्कृति की मूल आत्मा को सुरक्षित रखा। इसी मनोभाव को महामना ने भी एक शिक्षा व्यवस्था को विकसित करके हमारे सामने प्रस्तुत किया है। हमें इसके प्रति कृतज्ञ और जागरूक होना चाहिए।

संगोष्ठी के विशिष्ट अतिथि श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास परिसर के अध्यक्ष प्रो0 नागेन्द्र पाण्डेय ने कहा कि काशी विश्वनाथ धाम आज एक नये स्वरूप में हमारे साथ में है। अब महत्त्वपूर्ण यह है कि हमें इसका संरक्षण आगामी पीढ़ी के लिये करना चाहिय। यहाँ जैन और बौद्ध संस्कृतियाँ भी विकसित भी हुई साथ में सनातन हिन्दू संस्कृति का भी पर्याप्त विकास हुआ है। हमें इन सांस्कृतिक विरासतों को सुरक्षित और समृद्ध बनाने के लिए कार्य करना चाहिए। हमें हिन्दी बचाओं आन्दोलन की तरह हमें इन सांस्कृतिक विरासतों को बचाने के लिए भी प्रयत्नशील होना चाहिए।

कार्यक्रम के सारस्वत अतिथि पूर्व अतिरिक्त महानिदेशक (ए.डी.जी), भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण, नई दिल्ली के डॉ0 बी0 आर0 मणि ने आभासीय पटल के माध्यम से कहा कि भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण ने काशी के इस वर्तमान स्वरूप के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। विशेष रूप से उसके द्वारा किये गये शोध कार्यों के आधार पर वर्तमान स्थितियों का निर्माण सम्भव हो सका है। यहाँ प्राप्त अन्य साक्ष्यों से यह ज्ञात होता है कि यहाँ अविमुक्तेश्वर मंदिर का भी अस्तित्व था, जिसकी खोज और विकास करना हमारा दायित्व है।
उद्घाटन सत्र में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो0 विजय कुमार शुक्ल ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि सभी वक्ताओं ने बहुत ही सुन्दर विचार प्रस्तुत किये। सार रूप में यही कहा जा सकता है कि हमारी परम्पराओं और सांस्कृतिक विरासतों को चर्चा का विषय होना चाहिए तथा इन विषयों को हमारे शिक्षा व्यवस्था में शामिल करना चाहिए।

कार्यक्रम का विषय प्रवर्तन प्रो0 श्रीनिवास वरखेड़ी, कुलपति, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, दिल्ली द्वारा किया गया। उन्होंने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि इतिहास बोध के लिए इतिहास लेखन आवश्यक है। आज हम देखते है कि हमारी सांस्कृतिक विरासतों में गुणात्मक परिवर्तन आ रहा है। आवश्यकता है इन परिवर्तनों को लिपिबद्ध करने की और प्रकाशित करने की ताकि आगामी भारती समाज इन संघर्षों और चुनौतियों को जान सके। बदलाव आना चाहिये लेकिन यह मूलभूत सिद्धान्तों में नहीं जैसा कि श्री काशी विश्वनाथ धामि की विकास की यात्रा में देखते है।

संगोष्ठी के अध्यक्ष एवं वैदिक विज्ञान केन्द्र के समन्वयक प्रो0 उपेन्द्र कुमार त्रिपाठी ने अपने वाचित स्वागत में सभी समागत विद्वजनों और अतिथियों का स्वागत किया तथा काशी और अयोध्या आदि तीर्थस्थलों पर दैविक, भौतिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से परिचर्चा करने पर बल दिया। इस सत्र का संचालन संगोष्ठी के आयोजन सचिव डॉ0 प्रभाकर उपाध्याय ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन प्रो0 मृत्युंजय देव पाण्डेय ने किया। कार्यक्रम का प्रारम्भ वैदिक मंगलाचरण, कुलगीत एवं मालवीय जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण से हुआ।

कार्यक्रम के प्रथम अकादमिक सत्र के मुख्य वक्ता प्रो0 सीताराम दूबे, प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी ने ‘‘मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के कलाभिलेखीय साक्ष्य’’ विषय पर कहा कि रामकथा के अभिलेखीय एवं कला विषयक साक्ष्य दूसरी शताब्दी ई0पू0 से ही बड़ी संख्या में महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, कर्नाटक आदि क्षेत्रों से प्राप्त होते है, जो रामकथा की लोकप्रियता के परिचायक है।

मुख्य वक्त डॉ0 जितेन्द्रनाथ मिश्र, वरिष्ठ साहित्यकार, काशी ‘‘मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का लोकजीवन पर प्रभाव’’ विषय पर कहा कि भारतीय जन-जीवन में राम ऐसे रचे-बसे है कि यदि एक बच्चे का जन्म भी होता है तो गीता राम जन्म का गाया जाता है। विवाह होता है तो विवाह गीत में राम और सीता ही आते हैं। यहाँ तक की शवयात्रा में भी राम नाम सत्य ही बोला जाता है। मुख्य वक्ता प्रो0 कौशलेन्द्र पाण्डेय, आचार्य एवं अध्यक्ष, साहित्य विभाग, का.हि.वि.वि., वाराणसी ने कहा कि ने कहा कि काशी मोक्ष के साथ वैभव की भी नगरी है।
मुख्य वक्ता डॉ0 डी0पी0 शर्मा, पूर्व निदेशक, भारत कला भवन, का.हि.वि.वि., वाराणसी ने ‘‘श्री राम के काल के स्थलों  से प्राप्त अस्त्र भण्डार’’ विषय पर बोलते हुए कहा कि पुरातत्त्व की दृष्टि से रामायणकालीन स्‍थलों को 4000 ई0पू0 के काल से समीकृत किया जा सकता है। वक्ता के रूप में डॉ0 आरती शर्मा, दिल्ली एवं डॉ0 लक्ष्मण कुमार, तिरुपति, ‘‘राम जन्म भूमि मंदिर’’ के स्वरूप और उसके आर्थिक पक्षां पर प्रकाश डाला। इस प्रथम सत्र की अध्यक्षता प्रो0 दीनबन्धु पाण्डेय, पूर्व अध्यक्ष, कला इतिहास एवं पर्यटन प्रबन्ध, का.हि.वि.वि., वाराणसी एवं सदस्य, भारतीय समाज विज्ञान अनुसंधान परिषद्, गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय, हिसार ने किया।

संगोष्ठी के द्वितीय अकादमिक सत्र के मुख्य वक्ता प्रो0 शत्रुघ्न त्रिपाठी, ज्योतिष विभाग, का.हि.वि.वि., वाराणसी ने ‘‘प्रसाद वास्तु की दृष्टि में काशी विश्वेश्वर मंदिर एवं ज्ञानवापी’’ विषय पर प्रकाश डालते हुए अनेक प्राचीन वास्तुग्रन्‍थों के आधार पर काशी विश्वेश्वर मंदिर के प्राचीन स्वरूप की विवेचना की। कार्यक्रम के अगले मुख्य वक्ता डॉ0 हरिराम द्विवेदी, वरिष्ठ साहित्यकार, काशी ने कहा कि लोक संस्कृति में राम अनेक अवसरों में लोकगीतों में आते हैं। उन्‍होंने तीर्थयात्रा गीतां की विशेषता पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम के वक्ता डॉ0 पारूल, दिल्ली एवं डॉ0 रमन मिश्रा, भोपाल ने ‘‘श्री काशी विश्वनाथ धाम’’ के स्वरूप और उसके आर्थिक पक्षों पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम वक्ता डॉ0 प्रभाकर उपाध्याय, प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग, का.हि.वि.वि., वाराणसी ने ‘‘काशी और कोशल की ऐतिहासिक एवं पुरातात्त्विक पृष्ठभूमि’’ विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत की संस्कृति और सभ्यता वस्तुतः गांगेय क्षेत्र की संस्कृति और सभ्यता है, जिसके मूल्‍यों का विकास काशी और कोशल के क्षेत्र में हुआ। ये सांस्कृतिक मूल्य सार्वभौम है, जिसको जैन और बौद्ध परम्पराओं के साथ-साथ भारत के लोकजीवन ने भी आत्मसात किया।

इस सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो0 विजय शंकर शुक्ल, क्षेत्रीय निदेशक, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, वाराणसी ने कहा कि काशी इसीलिए काशी है क्‍योंकि  वह लोक का प्रतिनिधित्व करती है किन्तु हमारी अपनी परम्पराओं  में कहीं पर संदेह का प्रश्न उठे तो हमें अपनी शास्त्रीय परम्पराओं को प्रमाण मानना चाहिये। सम्पूर्ति सत्र के मुख्यातिथि प्रो0 हरेराम त्रिपाठी, कुलपति, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी, विशिष्टातिथि पद्मश्री प्रो0 राजेश्वराचार्य, पूर्व अध्यक्ष, गायन, दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर, सारस्वत अतिथि प्रो0 कमलेश झा, संकाय प्रमुख, संस्कृतविद्या धर्मविज्ञान संकाय, का.हि.वि.वि. एवं अध्यक्ष प्रो0 श्रीनिवास वरखेड़ी, कुलपति, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, दिल्ली रहे।इस संगोष्ठी का प्रसारण आभासी पटल पर भी किया गया, जिससे हजारों की संख्या में भारतीय इतिहास, संस्कृति, कला, पुरातत्व, वैदिक साहित्य, लोक साहित्य, तीर्थं, पर्यटन और लोक संस्कृति के विभिन्न पक्षों में रूचि रखने वाले विद्वान और प्रबुद्धजन जुड़ थे।

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